. 5 फरवरी भीष्म अष्टमी - निर्वाण दिवस /भीष्म पितामह की जीवन गाथा

हाड़ोती में हाड़ा राजवंश का काफी लम्बा शासनकाल रहा है यहां महाभारत काल से मत्स्य (मीणा जनजाति) निवास करती थी,१२४१ में स्थापित होने के पश्चात 1947 तक हाड़ोती के राजव्यवस्था की बागडोर हाड़ा राजवंश के हाथों में ही रहीं हैं हाड़ा राजवंश अपने स्थापत्य, शिकार प्रधान चित्र शैली,प्रजा वत्सल राजतंत्र, अनेकों युद्ध, अनेकों वीर, कर्तव्य प्रण क्षेत्राणिया , त्याग, बलिदान आदि के लिए जाना जाता है
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हाड़ा राजवंश की प्रारम्भिक राजधानी |
ओर जाने- राव सूरजमल हाड़ा का परिचय
हाड़ोती में हाड़ा राजवंश की स्थापना देवीसिंह हाड़ा चौहान ने की, हाड़ोती का उस समय केन्द्र बिन्दु बूंदी था ,इस समय यहां बूंदा मीणा(इसके नाम पर ही बूंदी नाम)के पोत्र जैंता का शासन था जिसे 1241 में देवा हाड़ा ने पराजित करके 1241 में बूंदी में हाड़ा राजवंश की स्थापना की, हाड़ा राजवंश दो बड़े राजवंश व १२ रियासतों (कोट रियासत)¹मे विभाजित था
•विरविनोद के कथन अनुसार के सार पर आधारित की सांभर के राजा सोमेश्वर के छोटे बेटे के उरथ की नोवी पीढ़ी मैं भोमचन्द्र हुआ। उसका पुत्र भानुराज जुआ । जिसका दूसरा नाम अस्थिपाल था। उसके वँश मैं देव सिंह हुये जिनोने बूंदी मैं अपना राज्य स्थापित किया ।
•राजपूत वंशावली मैं ठा.ईश्वर सिंह मडा़ढ़ के लेखानुसार चोहान वंश मैं भानुराज अस्थिपाल के नाम से प्रसीद्ध था। अस्थि को हिंदी मैं हड्डी या हाड़ भी कहते है इसलिये अस्थिपाल के वंसज हाड़ा कहलाये।
• इनके अतिरिक्त लल्लूभाई देसाई ओर जगदीश सिंह गहलोत आदि ने भी हाड़ावो को नाडोल के उपरोक्त आसराज के पुत्र मणिक्यराज से वंशज होना बताया ।
नाडोल के लक्ष्मण के पुत्र आसराज (अधिराज, अश्वपाल) के पुत्र माणिकराव का पुत्र था।
इनके बाद कि वंशावली निम्नानुसार है
3. अस्थिपाल
5. लोकपाल
6. हम्मीर
7. जोधराव
8. कलिकर्ण
9. महामुग्ध
11. रामचन्द्र
12. रेणसी
13. जेतराव
15. विजयपाल
16. हरराज (हाड़ा)
17. वंगा
18. राव देवा
उपरोक्त विश्लेषण का निष्कर्ष यह है कि नाडोल शाखा का अस्थिपाल (भांणवर्धन) ही हाड़ा शाखा का प्रथम- पुरुष था
राव देवा हाड़ा बुंदी पर अधिकार करने से पहले मेवाड़ के सामंत थे इनके अधिन क्षेत्र का नाम बम्बवादा था राव देवा हाड़ा एक वीर कुशल ओर योग्य शासक थे इन्होंने अंनको जनोपयोगी कार्य करवाए,
देवा हाड़ा ने अपने जीवनकाल में ही अपने शासन की बागडोर अपने पुत्र समरसिंह के हाथों सोप करें स्वयं ने संन्यास धारण कर लिया
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राव देवा हाड़ा |
देवा हाड़ा ने अमरथुण में गेग्शवरी देवी के मंदिर का निर्माण करवाया।
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