. 5 फरवरी भीष्म अष्टमी - निर्वाण दिवस /भीष्म पितामह की जीवन गाथा

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करमसी जोधावत |
कर्मसोत राठोड़ो का आदि पुरुष राव जोधा के पुत्र कु. करमसी थे , राव जोधाजी की दूसरी राणी भटियाणी पूरां के गर्भ से पैदा हुए थे। पूरा भाटी बैरसल चाचावत की पुत्री थी। इसके छः पुत्र हुए
(१) करमसी
(२) रायपाल
(३) बणवीर
(४) जसवन्त
(५) कूपा
(६) चान्दराव।
राव जोधा के कुल 21 पुत्र थे , करमसी राव जोधा के सबसे सुयोग्य पुत्रों में से थे, करमसी एक कुशल योद्धा के साथ साथ एक आज्ञाकारी पुत्र भी थे
इस समय राव जोधा के राज्य का विस्तार नाड़सर तक था, नागौर में इस समय फेतहपुर के फेतह का कायमखानी का अधिकार था करमसी किसी भी तरह से नागौर को जोधपुर में मिलाना चाहते थे, इसलिए वह अपने दो ओर भाईयों के साथ नागौर के फेतह खान के पास चले गए
फेतह खा ने करमसी को खिवसर वह रायपाल को आसोपा की जागीर प्रदान की, बणवीर अपने भाई करमसी के साथ खिवसर ही रहा, राव जोधा को उक्त घटना का पता चलने पर उन्होंने अपने तिनों राजकुमारो को नागौर छोड़ने का आदेश दिया, आदेश मिलते ही तिनों राजकुमार नागौर छोड़कर अपने भाई राव बिका के पास चले गए।
राव करमसी का ऐसे नागौर से चला जाना नवाब ने अपना अपमान समझा इसी वजह से उसने राव जोधा की जनता को परेशान करना शुरू कर दिया, इसी वजह से राव जोधा ने आक्रमण करके नागौर पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया, नवाब यहां से झुंझुनूं की तरफ भाग गया ।
इसके बाद राव जोधा ने करमसी को अपनी तरफ से खिवसर की जागीर प्रदान की ओर रायपाल को आसोप की जागीरी।
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खिंवसर दुर्ग का दरवाजा |
करमसी का विवाह मांगलिया भोज हमीरोत की पुत्री दूलदे के साथ हुआ । करमसी के पांच पुत्र हुए थे
नारनौल (ढोसी का युद्ध) -मार्च 1526
कर्मसी भोमियों से युद्ध करते समय लूणकरण (बीकानेर नरेश) के साथ नारनौल में मारा गया। ऐसा उल्लेख मुंशी देवी प्रसाद द्वारा संग्रहित राठौड़ों की वंशावली में भी है।
जोधपुर राज्य की ख्यात में भी यही उल्लेख है कि करमसी जोधावत लूणकरण के पास जाकर उनकी सेवा में रहते थे
बीकानेर से लूणकरण बीकावत नारनौल पर चढ़ कर गया। वहाँ भोमियों से लडाई हुई। वहाँ राव लूणकरण उनका पुत्र कुँवर प्रतापसी काम आया। वहाँ ही करमसी जोधावत भी काम आये। बांकीदास की ख्यात में भी यही उल्लेख है- करमसी जोधावत लूणकरण बीकावत की चाकरी में रहते थे।
नारनौल के गाँव ढुंसिये में युद्ध हुआ। करमसी और लूणकरण एकसाथ काम आये।
हमें इस आशय के उल्लेख देखने को मिलते हैं कि नारनोल से कोई तीन कोस की दूरी पर ढोसी नामक गांव में राव लूणकर्ण की बीकानेरी फौज के डेरे (कैम्प) हुए थे। राव लूणकर्ण के नेतृत्व में आई बीकानेरी फौज की शक्ति को देख कर कछवाहों तथा तंवरों को भी भय महसूस हुआ। परिणामतया पाटण के तंवर तथा अमरसर का रायमल शेखावत अपनी-अपनी सेना सहित, नारनोल के नवाब से जा मिले। नारनोल के नवाब ने बीकानेरी फौज की शक्ति का आकलन कर एक बार सुलह-समझौता करने की कोशिश की, परंतु राव लूणकर्ण ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
राव लूणकर्ण के सहयोगी उदयकरण के पुत्र कल्याणमल (बीदावत अमीर) की रायमल शेखावत से बड़ी मित्रता थी। अतएव, उसने रायमल शेखावत से मिल कर उसे यह कहा कि 'मैं हूं तो बीकानेर के राव लूणकर्ण की फौज के साथ परंतु संघर्ष शुरू होने पर मैं उसका साथ छोड़ कर भाग जाऊंगा।' तदनंतर उसने अपनी फौज में आकर भाटी हरा तथा जोहिया तिहुणपाल को भी अपने साथ मिला लिया और राव लूणकर्ण के साथ धोखा करने की पूरी योजना बना ली और इसकी सूचना नारनोल के नवाब को भी दे दी।
परिणामतया जब बीकानेर नरेश राव लूणकर्ण और नारनोल के नवाब के बीच युद्ध हुआ तो बीदावत अमीर कल्याण मल, भाटी हरा तथा जोहिया तिहुणपाल ने बीकानेरी फौज से किनारा कर लिया। विरोधी पक्ष की सैन्य शक्ति अधिक होने जाने के कारण राव लूणकर्ण की सेना के पांव उखड़ गए। परंतु फिर भी लूणकर्ण ने अपने बचे खुचे सहयोगियों कुंवर प्रतापसी, वैरसी और नेतसी के साथ वीरतापूर्वक नवाब का सामना किया, परंतु नवाब की सेना बहुत अधिक होने तथा भाटी, जोहियों आदि के शत्रु पक्ष से जा मिलने के कारण लूणकर्ण का पक्ष निर्बल हो गया था। इसलिए बीकानेरी फौज बुरी तरह से घिर गई। अंत में 28 जून, 1526 को 21 आदमियों को मार कर अपने पुत्र प्रतापसी, नैतसी, वैरसी, पुरोहित, देवीदास तथा कर्मसी के साथ राव लूणकर्ण इसी लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हो गया था। बीकानेर की इस हार को सुनिश्चित बनाने में बीकानेर के ही कतिपय अमीरों, सरदारों का हाथ रहा था, यह तथ्य यहां पर विशेष उल्लेख के योग्य है।
अतः एवं स्पष्ट है कि खिंवसर जागीरदार करमसी जोधावत अपने वृद्धावस्था में अपने भाई के पुत्र के नेतृत्व में नारनौल ढोसी में युद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। करमसी के पश्चात खिवसर जागीरदार पचांयण जी हुए।
करमसी के वंशज ही करमसोत कहलाते हैं
गीतसार - जोधपुर के राव जोधा का लघु पुत्र राव कर्मसिंह नाहड़सर का भी मालिक था। कर्मसिंह ने जोधपुर के शासक और बीकानेर के शासक राव लूणकर्ण सहित नारनौल पर हमला किया था। युद्ध की विपरीत स्थिति से भयभीत होकर कथित दोनों शासक रणभूमि से भाग गये पर राव कर्मसिंह युद्ध से नहीं हटा और जूझता हुआ नारनौल में काम आया। गीत में नारनौल स्थान पर पठानों से लड़ने का वर्णन है।
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