. 5 फरवरी भीष्म अष्टमी - निर्वाण दिवस /भीष्म पितामह की जीवन गाथा

बोरटा गांव के पास स्थित पहाड़ी पर नवनिर्मित नागणेचिया माता का मंदिर बनाया गया है। मंदिर के चारों दिशाओं में अलग-अलग देवताओं के मंदिर भी बनाए हुए है। मंदिर के सामने श्रद्धालुओं के बैठने के लिए विशाल चौकी, धर्मशालाएं का भी निर्माण किया गया है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु कुछ देर के लिए रुके इसके लिए यहां कमरों, सुंदर बगीचे का निर्माण भी करवाया गया है। पशु-पक्षियों के लिए विशाल चबूतरे का निर्माण भी करवाया हुआ है
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प्रवेश द्वार नागणेच्या माता मंदिर |
राठौड़ राव सलखाजी के द्वितीय पुत्र जैतमालजी के वंशज जैतमाल राठौड़ कहलाए। जैतमालजी के बड़े भाई मल्लीनाथजी ने सिवाना पर आक्रमण करके मुसलमानों को परास्त किया तथा सियाना का अधिपति अनुज जैतमाल को बनाया। राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर के संग्रह से जैतमालजी के बारह पुत्रों की जानकारी मिलती है-हापा, खीमकरण, बेजल, लुभा, चांपा, सोभा, रोडसल, माणकमल, नंदीदास, लखनजी, पाताजी और मेलोजी। जैतमालजी ने गुजरात के राघरा क्षेत्र सोडा (पंवार) राजपूतों से छीनकर अपने राज्य का विस्तार किया।
इष्टव्य है-
परमारां धर पालटी, घर जैताल आया।
गांम अड़तालीस में राड़धरा आया।।
राड्थरों कायम कियी, नरनामी वखतेत।
मैली रावल मालने, जथा बधाई जैत ।।
घर दानी आलम ढाणी परथल लूणी फास।
लिखिया ज्यांने लाभसी, राड्धरै रेवास।।
"जैतमल राव सलखा रो सो वडो सुरवीर दातार हुवाउ, अड़तलिस गामा सुण राधधारो लियो नै सिवानै राज कियो।
सालग्राम की उपाधि दी गई थी:
कोड़ कट्यों कवियाण री, भागी दरदाभिराम।
जा दिन बाजी जैतसी, दसमी सालगराम ।।
ग्राम बोरटा तहसील भीनमाल में जैतमाल राठौड़ निवास करते हैं तथा उनकी अपने इष्ट-आराध्यों के प्रति अटूट श्रद्धा और आस्था है।
रावों की बही के अनुसार जैतमालजी के वंशज सेंगरावजी हुए, सेंगरावजी के पुत्र रुथपालजी राव चूंडाजी एवं राव रणमल्लजी की सेवा में रहे।
साहेबरावजी के पुत्र बड़गोजी तथा अनुज सैलबी, वागजी, विजयसिंह, वीरमसिंह, मोहनसिंह ने वि.सं. 1422 ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को बोरटा गांव की स्थापना की यह भी प्रबल मान्यता है कि राव बड़गोजी के नाम अनुरूप बोरटा नामकरण गांव का भी किया गया है। बड़गोजी का विवाह केरोदे जुल्लाणी देवड़ीजी के साथ हुआ तथा इनके पांच पुत्र हुए-दूधसिंहजी, समेलसिंह कोमसिंहजी, मीडसिंहजी और जीकृसिंहजी।
बड़गाजी अपनी कुलदेवी श्री नागणेच्या माताजी के प्रति अटूट श्रद्धा भाव रखते थे। कोई भी कार्य वे माताजी के पावन चरणों में स्वयं उपस्थित होकर तथा प्रार्थना करके ही प्रारम्भ करते थे। एक जन श्रुति प्रचलित है कि एक बार बड़गाजी एवं उनके छोटे भाई सैलजी बाजरे की फसल ले रहे थे। दोनों भाईयों ने मिलकर खलिहान (लाटा) लिया और दोनों को बाजरों को अनुमानतः बराबर बांट दिया गया। रात्रि प्रहर के समय जब वे पहरा (निगरानी) रख रहे थे। तब बड़गाजी की अनुपस्थिति में अनुज सैलजी की आभास हुआ कि अग्रज बड़गाजी की बाजरी कम लग रही है अतः उन्होंने अपने हिस्से की थोड़ी बाजरी लेकर उनके हिस्से (डेरी) में मिला दी। जब सैलजी घर पर आये और बड़गाजी खलिहान पर आये,
तो उन्हें भी यह आभास हुआ कि अनुज की बाजरी की ढेरी में बाजरी कम लग रही है अतः उन्होंने अपनी डेरी से बाजरी लेकर उनके हिस्से वाली बाजरी में मिला दी। दोनों भाइयों में प्रेम समर्पण एवं अपनत्व को देखकर भातृत्व का भाव सरोवार हो गया। दोनों भाइयों के समर्पण भाव से कुलदेवी श्री नागणेचियां माताजी प्रसन्न हुए और बड़गाजी को साक्षात दर्शन दिया और कहा "कि कल सुबह सवा प्रहर दिन तक जितनी बाजरी इन दोनों डेरियों से सभी ग्रामवासी चाहे जितनी ले जा सकते हैं वे ले जाय इसमें कोई कमी नहीं आयेगी।
दे माता दीदार, कुलदेवी वचन कहिया ।
अन धन रा आनार, रहत्ती भरिया रावले ।।
उक्त चमत्कार की सूचना बड़गाजी द्वारा अपने अनुज सैलजी और अन्य समस्त ग्रामवासियों को दी गई तब सभी ग्रामवासियों ने अपने अपने साधन लेकर रातभर बाजरी ले जाते रहे जिनमें बैलगाड़ी, ऊंटगाड़ी एवं अन्य साधन लेकर सब लोगों ने अधिक से अधिक बाजरी ले जाने की उपक्रम किया। उक्त ग्रामीणों ने अपने धान के कोवर, भंडार आदि भर दिए, लेकिन उन दोनों बाजरी की डेरियों में से बाजरी जस की तस पहले की तरह पड़ी रही। इस घटना की जानकारी चारों और फैली कि वहां कोई चमत्कार हुआ है।
फलतः उक्त चमत्कार की जानकारी जब उनके भाणेज रायसिंह काबा गांव आकोली को मिली तो वे अपने गांव की और गये और अपने भाइयों के साथ बैल व ऊंट गाड़ी आदि साधनों के साथ बोरटा पहुंचे लेकिन तब तक सवा प्रहर दिन व्यतीत हो चुका था। देवी माँ ने सवा प्रहर दिन तक ही भक्त को कहा था। अतः वे वापस निराश होकर लौटने लगे। लौटते समय एक खेत में उन्हें मतीरी (कालिंगा) का ढेर नजर आया। वे उस डर को अपनी गाड़ियों में भरने लगे। फिर सारी गाड़िया कालिंगों से भर जाने के बाद भी वह घर पहले जैसा ही रह गया। यानि कुछ भी कम नहीं हुआ। तब उन्हें आभास हुआ कि मां नागणेचर्या का दिव्य आशीर्वाद हमें भी प्राप्त होने का सौभाग्य मिला है।
इस घटना से अभिभूत हो तत्समय कवि नेकहा-
बड़गाजी ने बाजरी, काबा ने कालिगा।
कुलदेवी कृपा करी, घरा बजाई धींग ।।
कुलदेवी के आशीर्वाद से बड़गाजी ने जन हितार्थ पीने के पानी की समस्या के निराकरण के लिए बोरटा ग्राम में विशाल तालाब का निर्माण करवाया, जो बड़गला तालाब के नाम से जाना जाता है।
बड़गाजी के पीढी में कमीरजी हुए, कमीरजी ने संवत 1580 में कमीरावां कुआ खुदवाया। साथ ही, उन्होंने दावा व अवड़ाा
बड़गाजी के ही पीढी में चूसिंहजी के पुत्र राणोजी हुए, जिन्होंने फाल्गुन सुदी 3 सर्वत् 1601 को जन-जीव हितार्थ कुआं खुदवाया, जी रोषार्थी कुंओं (कुटीयों) नाम से जाना जाता है। राणोजी बड़े बीर एवं पराक्रमी थे। महाराजा गजसिंहजी प्रथम की आदेशानुसार जालोर दुर्ग से सराई गजनीखांन व कमालखांन को मार भगाया व स्वयं नींवों की पोल में युद्ध करते हुए वीर गति प्राप्त की जिन्हें वर्तमान में झुझार के रूप में पूजा जाता है।
कुलदेवी माताजी के दिव्य चमत्कारों से अभिभूत हो ग्रामवासियों ने बड़गाजी की अगुवाई में माताजी की विधिवत स्थापना करवाई और पूजा अर्चना की ।
कुलदेवी श्री नागणेचियां माताजी का उक्त मन्दिर लोगों की आस्था का केन्द्र है अब उक्त मंदिर नव्य एवं संगमरमर के पत्र से भव्य रूप में नव निर्मित हुआ है. इसमें समस्त जैतमाल राठौड़ों की सहभागिता रही है। इस मंदिर की महीमा के फलस्वरूप जनमानस में यह स्थान मिनी नागाणा के रूप में प्रसिद्ध है
उक्त मन्दिर में कुलदेवी नागणेचियां माताजी की नवीन मूर्ति स्थापना एवं भव्यातिभव्य प्राण प्रतिष्ठा का मंगल आयोजन विक्रम संवत 2076 माघ शुक्ल पंचमी गुरुवार दिनांक 30 जनवरी 2020 से विक्रम संवत 2076 माघ शुक्ल सप्तमी शनिवार दिनांक 1 फरवरी, 2020 को आमन्त्रित महन्त मठाधीशों सान्निध्य एवं समस्त भक्तों के उपस्थिति में होना निश्चित हुआ है।
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