. 5 फरवरी भीष्म अष्टमी - निर्वाण दिवस /भीष्म पितामह की जीवन गाथा

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 भीष्म पितामह की जीवन गाथा भीष्म पितामह का जन्म का नाम देवव्रत था. इनके जन्म कथा अनुसार इनके पिता हस्तिनापुर के राजा शांतनु थे. एक बार राजा शांतनु, गंगा के तट पर जा पहुंचते हैं, जहां उनकी भेंट एक अत्यंत सुन्दर स्त्री से होती है. उस रुपवती स्त्री के प्रति मोह एवं प्रेम से आकर्षित होकर वे उनसे उसका परिचय पूछते हैं और अपनी पत्नी बनने का प्रस्ताव रखते हैं. वह स्त्री उन्हें अपना नाम गंगा बताती है और उनके विवाह का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए एक शर्त भी रखती है, की राजा आजीवन उसे किसी कार्य को करने से रोकेंगे नहीं और कोई प्रश्न भी नहीं पूछेंगे. राजा शांतनु गंगा की यह शर्त स्वीकार कर लेते हैं और इस प्रकार दोनो विवाह के बंधन में बंध जाते हैं. गंगा से राजा शान्तनु को पुत्र प्राप्त होता है, लेकिन गंगा पुत्र को जन्म के पश्चात नदी में ले जाकर प्रवाहित कर देती है. अपने दिए हुए वचन से विवश होने के कारण शांतनु, गंगा से कोई प्रश्न नहीं करते हैं . इसी प्रकार एक-एक करके जब सात पुत्रों का वियोग झेलने के बाद, गंगा राजा शांतनु की आठवीं संतान को भी नदी में बहाने के लिए जाने लगती है तो अपने वचन को तोड़ते हु...

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 राजनीतिक दलों की चिंता में डूबे हुए समाज को ,अपने पूर्वजों के सम्मान के लिए भी कुछ चिंतन करना चाहिए।


    जब इतिहास और पूर्वजों का सम्मान ही नष्ट हो जाएगा। तो देर सवेर ,एक ना एक दिन समाज का भी पतन हो जाएगा। 

  बिहार में नक्सलियों ने क्षत्रिय समाज को टारगेट किया। तो क्षत्रियों ने भी नक्सलियों का उनकी ही भाषा में प्रतिकार किया और अपने वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित किया।

     यदि समाज को अपने अस्तित्व ,इतिहास और पूर्वजों के सम्मान की रक्षा करनी है ।तो हर तरह के संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा। 

   यदि अफगानिस्तान में यह घटना होती। तो समझ में आता कि विधर्मियों ने यह कार्य किया।

   लेकिन यह बहुत ही शर्म का विषय है कि राजस्थान में सरकारी एजेंसियों के द्वारा ही यह घटना घटित हुई।

    राजस्थान में तो तालिबान का शासन नहीं है ।फिर यह घटना कैसे घटित हुई ?

  आखिर प्रशासन में ऐसे कौन से लोग हैं । जो तालिबानी मानसिकता के हैं ।उनकी पहचान कर उन्हें दंडित करना चाहिए ।

   और साथ ही साथ राजस्थान सरकार को हाड़ा जी की छतरी का पुनर्निर्माण उसी स्थान पर करना चाहिए।


   अन्यथा यह समझ जाएगा कि राजस्थान सरकार भी उन तालिबानी मानसिकता के अधिकारियों का साथ दे रही है।

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 क्षत्रिय समाज के भोमिया जो पूज्य हैं उनकी समाधि को वर्तमान सरकार एवं प्रशासन द्वारा ध्वस्त कर दिया गया 


किसी विशेष, महान, व्यक्तिव की समाधियों, स्मृति चिन्हों, उससे जुड़ी स्मृतियों को ध्वस्त करना तो आतंकवादी समूहों के कृत्य रहे हैं। याद नहीं अफगानिस्तान जहां धीरे धीरे वहां के उग्रवादी और आतंकवादी समूहों ने अपने देश के विश्व विरासत बौद्ध स्थलों को ध्वस्त कर दिया था?


फिर भी कहा जाए इस समाज में प्रतिक्रिया तो हुई लेकिन उस प्रतिक्रिया का प्रतिफल वह नहीं जो इस समाज के लिए अति महत्वपूर्व या संरक्षण पूर्ण होना चाहिए था।



इतनी बड़ी घटना इनके साथ हो गई और ये केवल अपनी एक विरासत के उसी जगह निर्माण पर लगे रहे।



होना तो ये चाहिए था कि क्षत्रिय समूह और उनके बुद्धिजीवी इस पर देश भर में प्रतिक्रिया देते और इसे अवसर बनाकर केंद्र एवं राज्य सरकारों से ऐसे कई मंदिर,धार्मिक स्थलों, विरासतों को अपने क्षत्रियों के अधिकार में लेते एवं राष्ट्रीय स्तरीय ट्रस्ट का निर्माण करते जो गैर क्षत्रिय वर्ग के हाथ में है अथवा सरकार एवं क्षत्रिय समाज के अनदेखी और अज्ञानता के कारण धूल खा रही हैं।



     

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